हिमाचल प्रदेश : - आईआईटी मंडी की खोज: कांगड़ा में पर्याप्त पानी, मंडी में संतुलन और कुल्लू में संकट

IIT मंडी के वैज्ञानिकों ने ब्यास बेसिन पर एक अध्ययन किया है जो स्पष्ट रूप से बता सकता है कि भूजल कहां उपलब्ध है और कहां आने वाले वर्षों में पानी की किल्लत बढ़ने वाली है।

हिमाचल प्रदेश में गहराते जल संकट के बीच अब अंधेरे में तीर चलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने ब्यास बेसिन पर एक ऐसा शोध किया है, जिससे यह साफ पता चल सकेगा कि भूजल कहां उपलब्ध है और कहां आने वाले वर्षों में पानी की किल्लत बढ़ने वाली है। रिमोट सेंसिंग और जीआईएस आधारित इस नई वैज्ञानिक पद्धति से पूरे ब्यास बेसिन को अलग-अलग भूजल जोन में बांटकर एक विस्तृत नक्शा तैयार किया गया है, जो नीति निर्धारण और जल प्रबंधन के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

शोध के निष्कर्षों के अनुसार पश्चिमी ब्यास बेसिन के इलाके भूजल की दृष्टि से सबसे समृद्ध पाए गए हैं। इसमें कांगड़ा जिला, देहरागोपीपुर, ज्वालामुखी, ज्वाली, नूरपुर, पौंग बांध क्षेत्र, धर्मशाला के निचले क्षेत्र और ऊना सीमा से सटे इलाके शामिल हैं। इन क्षेत्रों को बहुत अधिक और अधिक भूजल उपलब्धता वाले जोन में रखा गया है।

मध्य ब्यास बेसिन में मंडी जिला, बल्ह घाटी, सुंदरनगर और जोगिंद्रनगर जैसे क्षेत्र आते हैं। इन इलाकों में भूजल उपलब्धता को मध्यम श्रेणी में दर्ज किया गया है। वहीं, पूर्वी ब्यास बेसिन के पर्वतीय क्षेत्रों में स्थिति चिंताजनक पाई गई है। कुल्लू, मनाली, बंजार, आनी, ऊपरी मंडी के पहाड़ी इलाके और रोहतांग दर्रे के आसपास का हिमालयी क्षेत्र कम और बेहद कम भूजल उपलब्धता वाले जोन में शामिल किया गया है। शोध के अनुसार इन इलाकों में भविष्य में जल संकट और गहराने की आशंका है।

यह शोध आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग द्वारा किया गया है। इस अध्ययन को फैकल्टी सदस्य डेरिक्स पी शुक्ला, दीपक स्वामी और शोधार्थी उत्सव राजपूत ने अंजाम दिया है। शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल एनवायरमेंटल अर्थ साइंसेज में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन के तहत वर्ष 2022 के लिए ब्यास बेसिन का भूजल उपलब्धता नक्शा तैयार किया गया है, जिसके माध्यम से पूरे बेसिन को भूजल की उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग जोन में वर्गीकृत किया गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन हिमाचल ही नहीं, बल्कि देश के अन्य पर्वतीय और नदी बेसिन क्षेत्रों में भी भूजल प्रबंधन के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है। 

10 साल के आंकड़ों का विश्लेषण

इस अध्ययन में वर्ष 2012 से 2021 तक के 10 वर्षों के वर्षा आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया गया है। इसके अलावा भूमि उपयोग, ढाल, ऊंचाई, भूविज्ञान, मिट्टी की बनावट और ड्रेनेज डेंसिटी जैसे अहम कारकों को भी शामिल किया गया। इन सभी कारकों के संयुक्त विश्लेषण से भूजल उपलब्धता का वैज्ञानिक नक्शा तैयार किया गया।

क्या है नई वैज्ञानिक पद्धति

इस शोध में किसी नई मशीन या उपकरण का इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि भूजल आकलन की एक नई और आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति अपनाई गई है। इस पद्धति के तीन मुख्य आधार हैं -

रिमोट सेंसिंग : - उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के जरिए वर्षा, भूमि उपयोग, ढाल और ऊंचाई जैसी जानकारियां जुटाई गईं

जीआईएस आधारित मल्टी-लेयर विश्लेषण : -  भूविज्ञान, मिट्टी, ढाल, ड्रेनेज डेंसिटी समेत कुल 10 परतों को जीआईएस प्लेटफॉर्म पर एकीकृत कर विश्लेषण किया गया

भविष्य का अनुमान : - इन सभी आंकड़ों के आधार पर न केवल वर्तमान, बल्कि भविष्य की भूजल स्थिति का भी अनुमान लगाया गया

कम खर्चीली और नीति निर्माण में उपयोगी

आईआईटी मंडी के एसोसिएट प्रोफेसर डेरिक्स पी शुक्ला ने बताया कि यह अध्ययन भूजल उपलब्धता को समझने की एक नई वैज्ञानिक पद्धति प्रस्तुत करता है। यह तरीका कम खर्चीला, तेज और बड़े क्षेत्रों पर लागू किया जा सकता है। इसके जरिए सरकार और नीति निर्धारक जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज और भविष्य की जल योजनाओं को बेहतर ढंग से तैयार कर सकते हैं।

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